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स्वामी रामदेव की सेना

March 18, 2009

रामदेव की सेना आई
शत्रू की है शामत आई
काम,क्रोध और लोभ मोह सब
भाग रहे हैं तन को छोड़
रामदेव की सेना आई
सब के तन ने ली अँगड़ाई
प्राण चल पड़े भीतर बाहर
दायेँ बायेँ , बायेँ दायेँ

प्राणों की गाड़ी जब चलती
दक्शिण से उत्तर की और
एड़ी से चोटी तक चलती
और पूर्व से पश्चिम तट तक
हिलता हद‌य, हिलती नाभी
आँते हिलती, पसली हिलती
और भगा देती सब मल को
अन्दर से बाहर की और
तन तेजोमय, मन तेजोमय
हर हदय में उपजी भोर

रामदेव की सेना आई
हुई उथल पुथल, मच गया शोर
प्रात समय में जग जब सोया
पक्षी सोये, प्राणी सोये
निकल पड़े कितने ही लोग
नहीं भाग्य में जिनके स्वामी
उठ भागे ‘आस्था’ की और

शुरू हो गया वन्दे मातरम्
भारत की जय का उद्घोष
भारत जागा, भारत का जन जन सब जागा
बालक जागे, बूढ़े जागे
रोगी और निरोगी जागे
चल पड़े हैं कसे कमर सब
कर र‌र्हे कूच शत्रु की और

भाग रहे शत्रु भीतर से
न जाने बैठे थे कब से
तन में गाढ़े अपने झण्डे
मचा रहे थे घोर उपद्रव
जीवन को कर अपने कब्जे
निकल पडी अब फूँक सभी की
प्राणायाम की पड़ी जो चोट
योगी की सेना ने भर दी
सब में ऐसी शक्ती जोश
नही हताशा, नहीं निराशा
नई उमंग, बस नई सोच

रामदेव की सेना आई
भारत भर ने ली अँगड़ाई
सदियोँ से जो रहा बेचारा
जीवन में हर पल जो हारा
चाहत भी जीने की तज कर
खून के आँसू को पी पीकर
कैसा जीवन बिता रहा था
वही आज इस नवजीवन को
नई सुबह को नये प्राण को
भीतर् से बाहर तक भर कर
देखो कैसे झूम रहा है
निर्झर झरना ज्योँ पर्वत पर
कमल फूल ज्योँ ताल के जल पर

कोटी कोटी कर नमन स्वामी को
पूरे भारत की भूमी पर
योग की ज्योती जला रहे हैं
और ओउम का, पावन जप कर
अमरित रस बरसा रहे हैं

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